मंगलवार, 14 नवंबर 2017

साधना के नियम

साधना के नियम

आज मे साधको को वो नियम बताता हू जिनके कारण उनकी साधना सफल असफल होती है
कुछ साधको को तंत्र के प्राथमिक नियम नही पता है नतीजा ये रहता है कि साधना सफल नही होती

1  तंत्र का पहला नियम है कि ये एक गुप्त विधा है इसलिये इसके बारे मे आप केवल अपने गुरू के अलावा किसी अन्य को अपनी साधना या साधना के दोरान होनी वाली अनुभूति को किसी अन्य को न बताये
चाहे वो कोई हो चाहे कुछ हो
सपने तक किसी को नही बताये
यदि येसा किया जाता है तो जो अनुभूति मिल रही है वो बन्द हो सकती है साधना असफल हो सकती है
उग्र देव की साधना मे प्राण तक जाने का खतरा है
इसलिये क्सी से कुछ शेयर न करे सिवाय गुरू के

2  दूसरा नियम गुरू द्वारा प्रदान किये गये मंत्रो को ही सिद्ध करने की कोशिश करे

3. साधना काल मे यानि जितने दिन साधना करनी है उतने दिन ब्रह्मचर्य रखे
शारीरिक सम्बंध न बनाये
मानसिक ब्रह्मचर्य के टूटने की चिंता नही करे
इस पर किसी का वश नही है
जैसे नाइट फॉल

4.  साधना के दौरान कमरे मे पंखा कूलर न चलाये ये तीव्र आवाज करते है जिनसे ध्यान भंग होता है
एसी रूम मे बैठ सकते है
या पंखा बहुत स्लो करके बैठे
सबसे अच्छा यही है कि पंखा न चलाये
क्योकि साधना के दौरान होने वाली आवाज को अाप पंखे की आवाज मे सुन नही पाते हो

5  कमरे मे आप बल्ब भी बन्द रखे क्योकि ये पराशक्तियॉ सूक्ष्म होती है इने तीव्र प्रकाश से प्रत्यक्ष होने मे दिक्कत होती है

6.  जप से पहले जिस की साधना कर रहे हो उसे संकल्प लेते समय  जिस रूप यानि मॉ बहन पत्नी दोस्त दास रक्षक  जिस रूप मे करे उसका स्पष्ट उल्लेख करे
ताकि देवते को कोई दिक्कत न हो और वो पहले दिन से आपको खुलकर  अनुभूति करा सके

7.  जाप के समय ध्यान मंत्र पर ऱखे  कमरे मे होने वाली उठापटक या आवाज की तरफ ध्यान नही दे

8.   कोई भी उग्र साधना करने पर सबसे पहले रक्षा मंत्रो द्वारा अपने चारो ओर एक घेरा खींच ले
मे परी अप्सरा यक्ष गन्धर्व  जिन्न की साधना मे कवच नही करवाता किसी को कोई दिक्कत नही हुयी
आप भी इने बिना कवच के कर सकते है ये सौम्य साधना है
घर से बाहर हमेशा कवच करके बैठे

8 कवच चाकू , लोहे की कील , पानी , आदि से अपने चारो ओर मंत्र पढते हुये घेरा खीचे

9.  जाप के बाद अपराधो के लिये छमा अवश्य मॉगे

10. जाप के बाद उठते समय एक चम्मच पानी आसन के कोने के नीचे गिराकर उस पानी को माथे से  अवश्य लगाये
इससे जाप सफल रहता है

11.  साधना के दौरान भय न करे ये शक्तियॉ डरावने रूपो मे नही आते
अप्सरा यक्ष यक्षिणी परी
गन्धर्व विधाधर जिन्न आदि के रूप डरावने नही है मनुष्यो जैसे है आप इनकी साधना निर्भय होकर करे

12.  अप्सरा हमेशा प्रेमिका रूप मे सिद्ध करे

13 यक्षिणी जिस रूप मे सिद्ध की जाती है उस रूप को थोडी दिक्कत रहती है
लेकिन ये उने मारती नही है डरावने रूप भी नही दिखाती
कुछ यक्षिणी कोई भी कष्ट नही देती
अतएव आप निर्भय होकर इनकी साधना कर सकते है

14 सबसे जरूरी बात जो भी साधना सिद्ध होती है या सफल होती है तो पहले या दूसरे दिन प्रकृति मे कुछ हलचल हो जाती है यानि कुछ सुनायी देता है या कुछ दिखायी देता है या  कुछ महसूस होता है
यदि ऐसा न हो तो साधना बन्द कर दो वो सफल नही होगी
लम्बी साधना जैसे 40 या 60 दिनो वाली साधना मे सात दिन मे अनुभूति होनी चाहिये

15.   साधना के लिये आप जिस कमरे का चुनाव करे उसमे साधना काल तक आपके सिवा कोई भी दूसरा प्रवेश नही करे
कमरे मे कोई आये जाये ना सिवाय तुम्हारे

16.  साधना काल मे लगने वाली सूखी सामग्री का पूरा इंतजाम करके बैठे

17  फल फूल मिठाई  हमेशा प्रतिदिन ताजे प्रयोग करे

18.  पूरी श्रद्धा विश्वास एकाग्रता से साधना करे ये सफलता की कुंजी हैं

19. ये पराशक्तियॉ प्रेम की भाषा समझती हैं इसलिये आप जिस भाषा का ज्ञान रखते है इनकी उसी भाषा मे पूजन ध्यान प्रार्थना करे
इने सस्कृत या हिन्दी या अग्रेजी से कोई मतलब नही है
अगर आप गुजराती हो तो आप पूरा पूजन गुजराती मे कर सकते है अगर आप मराठी हो तो पूरा पूजन मराठी मे कर सकते हो  कोई दिक्कत नही होगी

20.  और ये महान  शक्तियॉ है इसलिये हमेशा इनसे सम्मान सूचक शब्दो मे बात करे

21.  साधना कोई वैज्ञानिक तकनीक नही है जैसा आप लोगो को बताया जा रहा है अगर येसा होता तो अब तक भूत प्रेत का अस्तित्व वैज्ञानिक साबित कर चुके होते
ये एक जीवित शक्तियो की साधना है जिसमे देवता का आना ना आन उस देव पर भी निर्भर करता है कि आपसे वो कितना खुश है

22.   येसा कभी नही होगा कि कोई भी 11 दिन 21 माला का जाप बिना श्रद्धा विश्वास  कर दे और अप्सरा आदि उसके समक्ष आकर खडी हो जाये

23.   मंत्रो की ध्वनि का जीवित व्यक्ति के श्रद्धा विश्वास जाप करने पर ही वातावरण मे प्रभाव होता है

विन्ध्याचल विन्ध्यवासिनी महात्म्य

'भगवती विंध्यवासिनी आद्या महाशक्ति हैं। विन्ध्याचल सदा से उनका निवास-स्थान रहा है। जगदम्बा की नित्य उपस्थिति ने विंध्यगिरिको जाग्रत शक्तिपीठ बना दिया है। महाभारत के विराट पर्व में धर्मराज युधिष्ठिर देवी की स्तुति करते हुए कहते हैं- विन्ध्येचैवनग-श्रेष्ठे तवस्थानंहि शाश्वतम्। हे माता! पर्वतों में श्रेष्ठ विंध्याचलपर आप सदैव विराजमान रहती हैं। पद्मपुराणमें विंध्याचल-निवासिनी इन महाशक्ति को विंध्यवासिनी के नाम से संबंधित किया गया है- विन्ध्येविन्ध्याधिवासिनी।

श्रीमद्देवीभागवत के दशम स्कन्ध में कथा आती है, सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने जब सबसे पहले अपने मन से स्वायम्भुवमनु और शतरूपा को उत्पन्न किया। तब विवाह करने के उपरान्त स्वायम्भुव मनु ने अपने हाथों से देवी की मूर्ति बनाकर सौ वर्षो तक कठोर तप किया। उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर भगवती ने उन्हें निष्कण्टक राज्य, वंश-वृद्धि एवं परम पद पाने का आशीर्वाद दिया। वर देने के बाद महादेवी विंध्याचलपर्वत पर चली गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि सृष्टि के प्रारंभ से ही विंध्यवासिनी की पूजा होती रही है। सृष्टि का विस्तार उनके ही शुभाशीषसे हुआ।

त्रेता युग में भगवान श्रीरामचन्द्र सीताजीके साथ विंध्याचल आए थे। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वर महादेव से इस शक्तिपीठ की माहात्म्य और बढ गया है। द्वापरयुग में मथुरा के राजा कंस ने जब अपने बहन-बहनोई देवकी-वसुदेव को कारागार में डाल दिया और वह उनकी सन्तानों का वध करने लगा। तब वसुदेवजीके कुल-पुरोहित गर्ग ऋषि ने कंस के वध एवं श्रीकृष्णावतार हेतु विंध्याचल में लक्षचण्डी का अनुष्ठान करके देवी को प्रसन्न किया। जिसके फलस्वरूप वे नन्दरायजीके यहाँ अवतरित हुई।

मार्कण्डेयपुराण के अन्तर्गत वर्णित दुर्गासप्तशती (देवी-माहात्म्य) के ग्यारहवें अध्याय में देवताओं के अनुरोध पर भगवती उन्हें आश्वस्त करते हुए कहती हैं, देवताओं वैवस्वतमन्वन्तर के अट्ठाइसवें युग में शुम्भऔर निशुम्भनाम के दो महादैत्य उत्पन्न होंगे। तब मैं नन्दगोप के घर में उनकी पत्नी यशोदा के गर्भ से अवतीर्ण हो विन्ध्याचल में जाकर रहूँगी और उक्त दोनों असुरों का नाश करूँगी।

लक्ष्मीतन्त्र नामक ग्रन्थ में भी देवी का यह उपर्युक्त वचन शब्दश: मिलता है। ब्रज में नन्द गोप के यहाँ उत्पन्न महालक्ष्मीकी अंश-भूता कन्या को नन्दा नाम दिया गया। मूर्तिरहस्य में ऋषि कहते हैं- नन्दा नाम की नन्द के यहाँ उत्पन्न होने वाली देवी की यदि भक्तिपूर्वक स्तुति और पूजा की जाए तो वे तीनों लोकों को उपासक के आधीन कर देती हैं।

श्रीमद्भागवत महापुराण के श्रीकृष्ण-जन्माख्यान में यह वर्णित है कि देवकी के आठवें गर्भ से आविर्भूत श्रीकृष्ण को वसुदेवजीने कंस के भय से रातोंरात यमुनाजीके पार गोकुल में नन्दजीके घर पहुँचा दिया तथा वहाँ यशोदा के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं भगवान की शक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा ले आए। आठवीं संतान के जन्म का समाचार सुन कर कंस कारागार में पहुँचा। उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर जैसे ही पटक कर मारना चाहा, वैसे ही वह कन्या कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुँच गई और उसने अपना दिव्य स्वरूप प्रदर्शित किया। कंस के वध की भविष्यवाणी करके भगवती विन्ध्याचल वापस लौट गई।

मन्त्रशास्त्र के सुप्रसिद्ध ग्रंथ शारदातिलक में विंध्यवासिनी का वनदुर्गा के नाम से यह ध्यान बताया गया है-

सौवर्णाम्बुजमध्यगांत्रिनयनांसौदामिनीसन्निभांचक्रंशंखवराभयानिदधतीमिन्दो:कलां बिभ्रतीम्।ग्रैवेयाङ्गदहार-कुण्डल-धरामारवण्ड-लाद्यै:स्तुतांध्यायेद्विन्ध्यनिवासिनींशशिमुखीं पा‌र्श्वस्थपञ्चाननाम्॥

अर्थ-जो देवी स्वर्ण-कमल के आसन पर विराजमान हैं, तीन नेत्रों वाली हैं, विद्युत के सदृश कान्ति वाली हैं, चार भुजाओं में शंख, चक्र, वर और अभय मुद्रा धारण किए हुए हैं, मस्तक पर सोलह कलाओं से परिपूर्ण चन्द्र सुशोभित है, गले में सुन्दर हार, बांहों में बाजूबन्द, कानों में कुण्डल धारण किए इन देवी की इन्द्रादि सभी देवता स्तुति करते हैं। विंध्याचलपर निवास करने वाली, चंद्रमा के समान सुन्दर मुखवाली इन विंध्यवासिनी के समीप सदा शिव विराजित हैं।

सम्भवत:पूर्वकाल में विंध्य-क्षेत्रमें घना जंगल होने के कारण ही भगवती विन्ध्यवासिनीका वनदुर्गा नाम पडा। वन को संस्कृत में अरण्य कहा जाता है। इसी कारण ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी विंध्यवासिनी-महापूजा की पावन तिथि होने से अरण्यषष्ठी के नाम से विख्यात हो गई है।

ध्यानः नंद गोप गृहे जाता यशोदा गर्भसम्भवा|

ततस्तो नाश यष्यामि विंध्याचल निवासिनी ||

||श्री विंध्यवासिनी माता स्तोत्रम||

निशुम्भशुम्भमर्दिनी, प्रचंडमुंडखंडनीम |

वने रणे प्रकाशिनीं, भजामि विंध्यवासिनीम ||१||

त्रिशुलमुंडधारिणीं, धराविघातहारणीम |

गृहे गृहे निवासिनीं, भजामि विंध्यवासिनीम ||२||

दरिद्रदु:खहारिणीं, संता विभूतिकारिणीम |

वियोगशोकहारणीं, भजामि विंध्यवासिनीम ||३||

लसत्सुलोललोचनां, लता सदे वरप्रदाम |

कपालशूलधारिणीं, भजामि विंध्यवासिनीम ||४||

करे मुदागदाधरीं, शिवा शिवप्रदायिनीम |

वरां वराननां शुभां, भजामि विंध्यवासिनीम ||५||

ऋषीन्द्रजामिनींप्रदा,त्रिधास्वरुपधारिणींम |

जले थले निवासिणीं, भजामि विंध्यवासिनीम ||६||

विशिष्टसृष्टिकारिणीं, विशालरुपधारिणीम |




गुरुवार, 2 नवंबर 2017

51 शक्तिपीठ महात्म्य

आइए जानते हैं 51 शक्तिपीठों के बारे में?

आदिशक्ति मां के 51 शक्तिपीठों की उपासना अनादिकाल से की जा रही है। धर्मग्रंथों के अनुसार 51 शक्तिपीठों की यात्रा मनोवांछित फल प्रदान करती है। तो आज हमारे साथ आप भी पढ़िये पवित्र 51 शक्तिपीठों का वर्णन और मांग लीजिए आदिशक्ति से अपनी मन की मुराद।

1.विमला-भुवनेश्वरी शक्तिपीठ- यहां सती का किरीट गिरा था..यह पावन स्थल किरीट में स्थित है.. यहां की शक्ति विमला यानि भुवनेश्वरी हैं और यहां भैरव संवर्त रूप में विराजमान हैं।

2.उमा शक्तिपीठ- यहां सती का केशपाश गिरा था..यह स्थल वृंदावन में अवस्थित है.. यहां की शक्ति देवी कात्यायनी हैं और भैरव भूतेश रूप में विराजमान हैं..

3.महिषमर्दिनी शक्तिपीठ- यहां सती का त्रिनेत्र गिरा था..यह पावन स्थली महाराष्ट्र के कोल्हापुर करवीर में अवस्थित है…यहां की शक्ति महालक्ष्मी हैं और यहां भैरव क्रोधीश रूप में विराजमान हैं..

4.श्रीसुंदीरी शक्तिपीठ- यहां माता सती का दक्षिण तल्प यानि कनपटी गिरा था..यह पावन स्थान श्रीपर्वत में है.. यहां की शक्ति श्री सुन्दरी हैं और भैरव सुन्दरानन्द रूप में विराजमान हैं…

5. विशालाक्षी शक्तिपीठ- यहां माता सती के कर्ण-मणि गिरे थे। यह पावन स्थान उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थित है …यहां की शक्ति विशालाक्षी और भैरव काल भैरव हैं।

6. विश्वमात्रिका शक्तिपीठ- यहां माता का वामगण्ड यानी बायां कपोल गिरा था। यह पावन स्थली गोदावरी तट पर स्थित है … यहां की शक्ति विश्वेश्वरी हैं और भैरव दण्डपाणि रुप में विराजमान हैं।

7. नारायणी शक्तिपीठ- यहां माता सती के उर्ध्व दन्त गिरे थे..यह पावन स्थान तमिलनाडु के शुचि में स्थित है.. यहां की शक्ति नारायणी हैं और भैरव संहार रूप में विराजमान हैं।

8. वाराही शक्तिपीठ- यहां माता के अधोदन्त गिरे थे..यह पावन स्थली पंचसागर पर स्थित हैं.. यहां की शक्ति वाराही हैं और भैरव महारुद्र रूप में विराजमान हैं।

9. सिद्धिदा, ज्वालामुखी शक्तिपीठ- यहां माता सती का जिह्वा गिरा था…यह पावन स्थल हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में स्थित है…यहां की शक्ति सिद्धिदा हैं और भैरव उन्मक्त रूप में विराजमान हैं।

10. अवन्ती शक्तिपीठ- यहां माता सती के ऊर्ध्व ओष्ठ गिरे थे…यह पावन स्थान भैरव पर्वत पर स्थित है…यहां की शक्ति अवन्ती हैं और भैरव लम्बकर्ण रूप में विराजमान हैं. इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतदभेद है। कुछ गुजरात के गिरिनार के निकट भैरव पर्वत को तो कुछ मध्य प्रदेश के उज्जैन के निकट क्षीप्रा नदी तट पर वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं, जहां माता का उफध्र्व ओष्ठ गिरा है। यहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण हैं.

11. फुल्लरा शक्तिपीठ- यहां माता सती का अधरोष्ठ यानी नीचे का होंठ गिरा था।यह पावन स्थली अट्टहास शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के लाबपुर में स्थित है। यहां की शक्ति फुल्लरा हैं औऱ भैरव विश्वेश रूप में विराजमान हैं…

12. भ्रामरी शक्तिपीठ- जहां माता का ठुड्डी गिरी थी।यह पावन स्थली जनस्थान में स्थित है.. यहां की शक्ति भ्रामरी हैं और भैरव विकृताक्ष रूप में विराजमान हैं.

13. महामाया शक्तिपीठ- यहां माता का कण्ठ गिरा था। यह पवित्र स्थली कश्मीर में स्थित हैं… यहां की शक्ति महामाया हैं और यहां भैरव त्रिशंध्येश्वर रूप में विराजमान हैं।

14. नन्दिनी शक्तिपीठ- यहां माता सती का कण्ठहार गिरा था..यह पवित्र स्थान नन्दीपुर में स्थित है..यहां की शक्ति नन्दिनी हैं और भैरव नन्दिकेश्वर रूप में विराजमान हैं…

15. महालक्ष्मी शक्तिपीठ- यहां माता का ग्रीवा गिरा था..यह पावन स्थान आंध्रप्रदेश के श्रीशैल में स्थित हैं… यहां की शक्ति महालक्ष्मी है और यहां भैरव ईश्वरानन्द रूप में विराजमान हैं।

16. कालिका शक्तिपीठ- यहां माता की उदरनली गिरी था..यह पावन स्थान पं बंगला के नलहटी में स्थित है.. यहां की शक्ति कालिका हैं औऱ यहां भैरव योगीश रूप में विराजमान हैं।

17. उमा शक्तिपीठ- यहां माता का वाम स्कंध् गिरा था। यह पावन स्थली मिथिला में है… यहां की शक्ति उमा हैं औऱ यहां भैरव महोतर रूप में विराजमान हैं।

18. कुमारी शक्तिपीठ- यहां माता का दक्षिण स्कंध् गिरा था। यह पावन स्थान रतनावली में स्थित हैं…यहां की शक्ति कुमारी हैं और भैरव शिव रूप में विराजमान हैं।

19. चन्द्रभागा शक्तिपीठ (अम्बाजी शक्तिपीठ, प्रभास पीठ)- यहां माता का उदर गिरा था।यह स्थान प्रयाग में स्थित है..यहां की शक्ति अवन्ति और भैरव वक्रतुण्ड रूप में विराजमान हैं. गुजरात गूना गढ़ के गिरनार पर्वत के प्रथत शिखर पर देवी अिम्बका का भव्य विशाल मन्दिर है, यहां की शक्ति चन्द्रभागा तथा भैरव वक्रतुण्ड है। ऐसी भी मान्यता है कि गिरिनार पर्वत के निकट ही सती का उध्र्वोष्ठ गिरा था, जहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण है।

20.त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ-( जालंधर शक्तिपीठ)- यहां माता का वामस्तन गिरा था।यह स्थान पंजाब के जालन्धर में स्थित है..यहां की शक्ति त्रिपुरमालिनी हैं और भैरव भीषण रूप में विराजमान हैं।

21. शिवानी शक्तिपीठ-  यहां माता का दाहिना स्तन गिरा था..यह स्थान रामागिरी में स्थित हैं. यहां की शक्ति शिवानी हैं और भैरव चन्द्र रूप में विराजमान हैं.

22. जय दुर्गा शक्तिपीठ(वैद्यनाथ का हार्द शक्तिपीठ)- यहां माता का ह्रदय गिरा था…यह स्थान झारखंड के देवघर में स्थित है…यहां की शक्ति जयदुर्गा हैं औऱ भैरव वैद्यनाथ रूप में विराजमान है।

23. महिषमर्दिनी शक्तिपीठ- यहां माता का मन गिरा था।यह पवित्र स्थल वकत्रेश्वर में स्थित है…यहां की शक्ति महिषासुरमर्दिनी हैं औऱ भैरव वकत्रनाथ रूप में विराजमान हैं.

24. शर्वाणी शक्तिपीठ- यहां माता का पीठ गिरा था..यह पवित्र स्थल तमिलनाडु के कण्यकाश्रम में स्थित हैं….यहां की शक्ति नारायणी हैं भैरव निमिष रूप में विराजमान हैं।

25. बहुला शक्तिपीठ- यहां माता का वाम बाहु गिरा था। यह पावन स्थली पश्चिम बंगाल के बहुला में स्थित है…यहां की शक्ति बहुला हैं औऱ भैरव भीरुक रूप में विराजमान हैं।

26.मंगलचण्डिका- यहां माता का कुहनी गिरा था।यह पावन स्थान मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित है यहां की शक्ति मंगलचण्डिका हैं औऱ भैरव मांगल्य कपिलांबर रूप में विराजमान हैं।

27.गायत्री शक्तिपीठ- यहां माता की कलाइयां गिरी थीं…यह पावन स्थान राजस्थान,पूष्कर के मणिदेविका में स्थित है…यहां की शक्ति गायत्री हैं और भैरव सर्वानन्द रूप में विराजमान हैं।

28. ललिता शक्तिपीठ ( प्रयाग)– यहां माता की हाथ की अंगुलियां गिरी थी। यह पावन स्थान उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में स्थित है। यहां की शक्ति ललिता हैं और भैरव भव रूप में विराजमान हैं।

29. विमला शक्तिपीठ– यहां माता की नाभि गिरी थी. यह पावन स्थान विराजक्षेत्र में स्थित है… यहां की शक्ति विमला हैं औऱ भैरव जगन्नाथ रूप में विराजमान हैं।
उत्कल शक्तिपीठ उड़ीसा के पुरी और याजपुर में माना जाता है जहां माता की नाभि गिरा था। यहां की शक्ति विमला तथा भैरव जगन्नाथ पुरुषोत्तम हैं।

30. देवगर्भा शक्तिपीठ (कांची-) यहां माता का कंकाल गिरा था। यह पावन स्थान तमिलनाडु के कांचीवरम् में स्थित है… यहां की शक्ति देवगर्भा तथा भैरव रुद्र रूप में विराजमान हैं।

31.काली शक्तिपीठ- यहां माता का वाम नितम्ब गिरा था।यह पावन स्थान कालमाधव में स्थित हैं… यहां की शक्ति काली हैं और भैरव आसितांग हैं।

32.नर्मदा शक्तिपीठ- यहां माता का दक्षिण नितम्ब गिरा था।यह पावन स्थान मध्यप्रदेश के शोण में स्थित है… यहां की शक्ति नर्मदा हैं औऱ भैरव भव्यसेन रूप में विराजमान हैं. मध्य प्रदेश के अमरकंटक के नर्मदा मन्दिर शोण शक्तिपीठ है। एक दूसरी मान्यता यह है कि बिहार के सासाराम का ताराचण्डी मन्दिर ही शोण तटस्था शक्तिपीठ है। यहां सती का दायां नेत्रा गिरा था ऐसा माना जाता है। यहां की शक्ति नर्मदा या शोणाक्षी तथा भैरव भद्रसेन हैं।

33. कामाख्या शक्तिपीठ- यहां माता का योनि गिरा था। यह स्थान असम गुवाहाटी के कामगिरि पर्वत पर स्थित है…यहां की शक्ति कामाख्या हैं और भैरव उमानन्द रूप में विराजमान हैं।

34.जयन्ती शक्तिपीठ- यहां माता का वाम जंघा गिरा था।यह पावन स्थान मेघालय के जयन्ती पहाडी पर स्थित है..यहां की शक्ति जयन्ती और भैरव कमदीश्वर रूप में विराजमान हैं।

35. सर्वानन्दकरी शक्तिपीठ- यहां माता का दाहिना जंघा गिरा था।यह पावन स्थान बिहार के मगध में स्थित हैं… यहां की शक्ति सर्वानन्दकरी और भैरव योनकेश रूप में विराजमान हैं. बिहार की राजधनी पटना में स्थित पटनेश्वरी देवी को ही शक्तिपीठ माना जाता है.

36. भ्रामरी शक्तिपीठ- यहां माता का वामपाद गिरा था। यह पावन स्थान पश्चिम बंगाल के तीस्ता नदी पर स्थित है… यहां की शक्ति भ्रामरी और भैरव ईश्वर रूप में विराजमान हैं।

37. त्रिपुरसुन्दरी शक्तिपीठ- यहां माता का दक्षिण पाद गिरा था।यह पावन स्थान त्रिपुरा में स्थित है …यहां की शक्ति त्रिपुरसुन्दरी हैं औऱ भैरव त्रिपुरेश रूप में विराजमान हैं।

38. कापालिनी शक्तिपीठ- यहां माता का बायां टखना गिरा था।यह पावन स्थान पश्चिम बंगाल के विभाष क्षेत्र में स्थित है.. यहां की शक्ति कापालिनी, और भैरव सर्वानन्द रूप में विराजमान हैं।

39. सावित्री शक्तिपीठ- यहां माता के दहिने चरण गिरे थे…यह पावन स्थान हरियाणा के कुरुक्षेत्र में स्थित है … यहां की शक्ति सावित्री और भैरव स्थाणु रूप में विरामान हैं।

40. भूतधात्री शक्तिपीठ- यहां सती के दाहिने चरण का अंगूठा गिरा था।यह पावन स्थान पश्चिम बंगाल क्षीरग्राम स्थित युगाद्या में स्थित है…यहां की शक्ति भूतधात्री और भैरव श्रीकंटक रूप में विराजमान हैं….

41. अम्बिका शक्तिपीठ- यहां माता सती के दक्षिण पादांगुलियां गिरी थीं। यह पावन स्थान राजस्थान के वैराटग्राम में स्थित है… यहां की शक्ति अंबिका और भैरव अमृत रूप में विराजमान हैं।

42. कालीका शक्तिपीठ- यहां माता के दाएं पांव की अंगूठा के अलावे 4 अन्य अंगुलियां गिरी थीं। यह पावन स्थान कोलकाता के कालीघाट में स्थित है(कालीमन्दिर)…यहां की शक्ति कालिका और भैरव नकुलीश रूप में विराजमान हैं।

43. दाक्षायणी शक्तिपीठ- यहां माता की दाहिनी हथेली गिरी थी… यह पावन स्थान तिब्बत के मानसरोवर तट पर स्थित है …(मानस शक्तिपीठ)… यहां की शक्ति की दाक्षायणी और भैरव अमर रूप में विराजमान हैं।

44. इन्द्राक्षी शक्तिपीठ- यहां माता का नूपुर गिरा था। यह पावन स्थान श्रीलंका में स्थित है(लंका शक्तिपीठ) यहां की शक्ति इन्द्राक्षी और भैरव राक्षसेश्वर रूप में विराजमान हैं।

45.गण्डकी शक्तिपीठ- यहां सती के दक्षिणगण्ड (कपोल) गिरा था।यह स्थान नेपाल में गण्डकी नदी के उद्गम पर स्थित है…(गण्डकी शक्तिपीठ).. यहां की शक्ति गण्डकी और भैरव चक्रपाणि रूप में विराजमान हैं।

46.महामाया शक्तिपीठ- यहां माता सती के दोनों घुटने गिरे थे।यह पानव स्थली नेपाल के काठमाण्डू में पशुपतिनाथ मन्दिर के पास ही स्थित है… (गुह्येश्वरी शक्तिपीठ)…, यहां की शक्ति `महामाया´ और भैरव `कपाल´रूप में विराजमान हैं।

47. कोटट्री शक्तिपीठ, कोटट्री – यहां माता का ब्रह्मरन्ध्र गिरा था।यह स्थान पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान प्रान्त में स्थित है ..यहां की शक्ति माता हिंगलाज और भैरव भीमलोचन रूप में विराजमान हैं..

48.सुनन्दा शक्तिपीठ- यहां माता का नासिका गिरा था।यह पावन स्थली बांग्लादेश के खुलना में सुगंध नदी के तट पर स्थित है… यहां की शक्ति देवी सुनन्दा हैं औऱ भैरव त्रयम्बक रूप में विराजमान हैं। (उग्रतारा देवी का शक्तिपीठ)

49. अपर्णा शक्तिपीठ- यहां माता का वाम तल्प गिरा था।यह पावन स्थान बंग्लादेश के करतोया नदी के तट पर स्थित है( करतोयाघाट शक्तिपीठ) यहां की शक्ति देवी अपर्णा हैं औऱ भैरव वामन रूप में वास करते हैं।

50. भवानी शक्तिपीठ- यहां माता की दाहिनी भुजा गिरी थी.. यह पावन स्थान बंग्लादेश के चटगांव में स्थित है ..(चट्टल का भवानी शक्तिपीठ) । यहां की शक्ति भवानी और भैरव चन्द्रशेखर रूप में विराजमान हैं।

51. यशोरेश्वरी शक्तिपीठ- यहां माता की बायीं हथेली गिरी थी..यह पावन स्थान बांग्लादेश के यशोर में स्थित है..(यशोरेश्वरी शक्तिपीठ) .. यहां की शक्ति यशोरेश्वरी और भैरव चन्द्र रूप में विराजमान हैं।

महिसासुर मर्दिनी स्तोत्र

महिषासुरमर्दिनि   स्तोत्रम्

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥

 सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

 अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥

 अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥

 अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥

 अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥

 अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥

 धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥

 सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥

 जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥

 अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥

 सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥

 अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥

 कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥

 करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥

 कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥

 विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥

 दकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥

 कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥

 तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥

 अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥


जय माँ विंध्यवासिनी

तुरंत सफलता के लिए माँ विंध्यवासिनी की पूजा करना चाहिए। शास्त्रों में माँ विंध्यवासिनी की रहस्यमयी तांत्रिक साधना वर्णित है। यह साधना अत्यंत गोपनीय है। इसके माध्यम से किसी भी कार्य में तुरंत सफलता प्राप्त होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो तुरंत सफलता प्राप्ति के लिए विंध्यवासिनी साधना उपयोगी होती है।

विनियोग
ओम् अस्य विंध्यवासिनी मन्त्रस्य
विश्रवा ऋषि अनुष्टुपछंद: विंध्यवासिनी
देवता मम अभिष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोग:।

न्यास
ओम विश्रवा ऋषये नम: शिरसि
अनुष्टुप छंदसे नम: मुखे ।।2।।

विंध्यवासिनी देवतायै नम: हृदि ।।3।।
विनियोगाय नम: सर्वांगे ।।4।।

करन्यास
एहं हिं अंगुष्ठाभ्यां नम:।।1।।
यक्षि-यक्षि तर्जनीभ्यां नम:।।2।।
महायक्षि मध्यमाभ्यां नम: ।।3।।
वटवृक्षनिवासिनी अनामिकाभ्यां नम:।।4।।
शीघ्रं मे सर्वसौख्यं कनिष्ठिकाभ्यां नम:।।5।।
कुरू-कुरू स्वाहा करतलकर पृष्ठाभ्यां नम:।।6।।

ध्यान
अरूणचंदन वस्त्र विभूषितम।
सजलतोयदतुल्यन रूरूहाम्।।
स्मरकुरंगदृशं विंध्यवासिनी।
क्रमुकनागलता दल पुष्कराम्।।

प्रयोग विधि
इस महत्वपूर्ण एवं अत्यंत गोपनीय साधना को भाग्यशाली साधक ही कर पाता है। अमावस्या की रात को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर सामने विंध्यवासिनी साधना मंत्र प्रतिष्ठापित करे। सामने की तरफ सात गोल सुपारी रख लें। घी का दीपक एवं 7 अगरबत्ती जलाएँ।

सप्त सुपारी पूजा
ओम् कामदायै नम:।।1।।
ओम् मानदायै नम:।।2।।
ओम् नक्तायै नम: ।।3।।
ओम् मधुरायै नम: ।।4।।
ओम् मधुराननायै नम: ।।5।।
ओम् नर्मदायै नम: ।।6।।
ओम् भोगदायै नम:।।7।।

तत्पश्चात सोने के बेहद बारीक तार से विंध्येश्वरी यंत्र को लपेटें तथा सफलता के लिए प्रार्थना करें। जिस कार्य में तुरंत सफलता चाहिए उसका सिलसिलेवार स्मरण करें। जैसे उस कार्य के आरंभ से लेकर मंत्र साधना तक क्या-क्या उतार-चढ़ाव आए। कितनी बाधाएँ आईं और सफलता के संबंध में आपकी शंकाएँ क्या-क्या हैं।

पूजन के बाद स्फटिक की माला से मंत्र का जाप करें। 11 दिन तक रोज 51 माला मंत्र जप विंध्यवासिनी यंत्र के सामने आवश्यक है।

मंत्र
एह्ये हि यक्षि महायक्षि
विंध्यवासिनी शीघ्रं मे
सर्व तंत्र सिद्धि कुरू-कुरू स्वाहा।

यह साधना 11 दिनों तक नियमित रूप से की जानी चाहिए। सौभाग्यशाली साधकों के मार्ग में साधना के दौरान कोई बाधा नहीं आती। इस साधना के सफल होने के बाद अन्य कोई साधना निष्फल नहीं होती। साथ ही तुरंत सफलता प्राप्ति हेतु यह साधना अत्यंत उपयोगी है।